भगत सिंह तो सभी चाहते हैं पर पड़ोसी के घर में……. शाहनवाज भारतीय

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नई दिल्ली: आज एक साहब ने ग़ज़ब ही कहा कि पढ़ लिख लिए हो न तो नौकरी कर लो समाज सुधारने की कोशिस भी मत करो, तीन पीढ़ी बर्बाद हो जाएगी! तुमसे पहले वाली पीढ़ी की उम्मीद, तुम्हारी पीढ़ी का वर्तमान और तुमसे अगली पीढ़ी का भविष्य!

मैंने कहा साहब तीनों पीढ़ी देख लिया है, कुछ नहीं करने का तो कई बार सोचता हूँ पर देश में हो रही घटनाओं की वजह से कई बार नींद नहीं आती; सोचता हूँ कि अपना आँख बन्द करने से तो अंधेरा होगा नहीं, जहाँ तक क्षमता है संघर्ष करता जाता हूँ वरना जब हमारा यह हाल है तो अगर अभी भी कुछ नहीं किया तो अगली नस्ल का क्या होगा! हमारे समाज और इस देश का क्या होगा? किसी ना किसी को तो त्याग करना होगा! एक पीढ़ी ने वलिदान दिया तो हम आज़ाद हो पाए, अगर उन्होंने भी यही सोचा होता तो, आज भी हम अंग्रेजों के ग़ुलाम होते! समस्या यह है कि आज भी भगत सिंह तो सभी चाहते हैं पर पड़ोसी के घर में! ऐसे कैसे चलेगा? देश में जब तक शांति और आपसी भाईचारा क़ायम नहीं होता देश कभी भी तरक़्क़ी नहीं कर सकता!

आगे मैंने कहा अगर देश का इतिहास देखना हो तो 1925 से पहले का इतिहास देखिये 1992 और उसके बाद का नहीं! बीच में क़ायदों ने मुजरों में अपनी जवानी बर्वाद कर दीं अब मुशायरों में कर रहे हैं, तो याद रखिए, ” इक़रा पे लब्बैक कहने वाली क़ौम जब मुशायरों में झूमने लगे तो उसकी क़यादत कोई कौव्वाल ही करेगा कलाम नहीं”! और हाँ मुख़लिसों की क़यादत बड़ी मुश्किल से मिलती है, पर समस्या यह है कि आज के ज़्यादातर हमारे क़ायद वो हैं, जो ख़ुद ग़ुलाम हैं! अगर क़ायद मुख़लिस चाहिए तो उनको बनाना होगा, स्वतः ही बनने का इंतेजार नहीं करना चाहिए!

जाते जाते हमने कहा करैला नीम पे जा के बनिस्बत अच्छा हो गया; उसने झूठ इतना बोला के सच्चा हो गया (ताहिर फ़राज़) ! पर हमारा यह मानना है कि, ”

मिरे जुनूँ का नतीजा ज़रूर निकलेगा
इसी सियाह समुंदर से नूर निकलेगा

गिरा दिया है तो साहिल पे इंतिज़ार न कर
अगर वो डूब गया है तो दूर निकलेगा

उसी का शहर वही मुद्दई वही मुंसिफ़
हमें यक़ीं था हमारा ही क़ुसूर निकलेगा

यक़ीं न आए तो इक बात पूछ कर देखो
जो हँस रहा है वो भी ज़ख़्मों से चूर निकलेगा

उस आस्तीन से अश्कों को पोछने वाले
उस आस्तीन से ख़ंजर ज़रूर निकलेगा
-अमीर क़ज़लबाश

लेखक: शाहनवाज भारतीय